गोकुल में जहाँ कृष्ण होते थे वहाँ शांति भी मुस्कुराती हुई लगती थी। उस दिन यशोदा ने उन्हें प्रेम से बाँधकर उखल के पास बैठाया था, पर कृष्ण की आँखों में उदासी नहीं थी। वे धीरे-धीरे उखल को खींचते हुए आँगन के उस भाग की ओर बढ़े जहाँ दो ऊँचे अर्जुन वृक्ष साथ-साथ खड़े थे।
परंपरा कहती है कि ये वृक्ष केवल पेड़ नहीं थे। वे दो ऐसे दिव्य भाइयों की याद थे जो अभिमान में कठोर हो गए थे। जब मनुष्य आभार भूल जाता है, तो वह बाहर से ऊँचा दिख सकता है, पर भीतर से जड़ हो जाता है। कृष्ण ने उखल सहित उन दोनों वृक्षों के बीच से निकलना चाहा। उखल अटक गया। कृष्ण ने फिर खींचा। पत्ते काँपे, पक्षी उड़ गए, और एक गूँजते हुए शब्द के साथ दोनों वृक्ष धरती पर आ गिरे।
यह पल डर का नहीं, मुक्ति का है। जो लंबे समय से कठोर था, वह टूटकर खुल गया। उन वृक्षों से जुड़ी आत्माओं ने अपनी भूल को समझा और कृपा को पहचाना। उन्हें ज्ञात हुआ कि महानता ऊँचा खड़े रहने में नहीं, विनम्र होने में है।
यही कारण है कि यह कथा परिवारों को प्रिय है। बच्चों के लिए इसमें आश्चर्य है; बड़े होने पर इसमें अर्थ दिखाई देता है। कुछ लोग रस्सियों से नहीं, आदतों, क्रोध और अभिमान से बँध जाते हैं। प्रेम से बँधे कृष्ण ही दूसरों को मुक्त करते हैं। यमल-अर्जुन की कथा हमें सिखाती है कि कृपा अक्सर जीवन के सबसे साधारण क्षणों से ही आरंभ होती है।