लंका वैभव से भरी नगरी थी. उसके महलों में प्रकाश था, सामर्थ्य था, और राजसी गौरव था. फिर भी बाहरी चमक के भीतर एक गहरी अशांति बढ़ रही थी. रावण का दरबार शक्तिशाली था, पर वह सुनने की क्षमता खोता जा रहा था. इस भारीपन को सबसे स्पष्ट रूप से महसूस करने वालों में विभीषण थे.
विभीषण की पहचान ऊंची आवाज नहीं, स्पष्ट अंतरात्मा है. वे जानते थे कि परिवार के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ऊपर धर्म है. जब निर्णय केवल अभिमान से लिए जाने लगते हैं, तो उनका परिणाम पूरे राज्य पर पड़ता है. इसलिए विभीषण ने मौन को नहीं चुना. उन्होंने वह कहा जो सही था, चाहे सुनने वालों को वह पसंद न आए.
परिवारों के लिए कही जाने वाली कथा में विभीषण पहले संघर्ष नहीं चुनते; वे सलाह देते हैं. वे रावण से आग्रह करते हैं कि गलत दिशा छोड़कर धर्म की ओर लौटे. अच्छी सलाह अक्सर शांत स्वर में आती है. पर उसकी शक्ति कम नहीं होती. सच बोलना, विशेषकर उस जगह जहां सच नहीं सुना जाना चाहता, बहुत बड़ा साहस है.
जब रावण उस वाणी को अस्वीकार करता है, तब विभीषण के सामने कठिन प्रश्न खड़ा होता है: क्या केवल साथ बने रहना ही निष्ठा है, या सत्य के साथ खड़ा होना उससे भी गहरा कर्तव्य है? यही इस कथा का केंद्र है. विभीषण क्रोध से नहीं, दुख और स्पष्टता के साथ अलग होते हैं. वे जानते हैं कि मौन रहना भी कभी-कभी अन्याय का भाग बन जाना है.
जब वे राम के पास आश्रय लेने आते हैं, तब कहानी का दूसरा प्रकाश दिखता है. एक ओर गलत को छोड़ने का साहस है, दूसरी ओर सत्यनिष्ठ हृदय को स्वीकार करने की उदारता. इसलिए विभीषण की कथा हमें सिखाती है कि सच्चा वीरत्व केवल युद्धभूमि में नहीं होता; कई बार वह उस वाक्य में होता है जो शांत होकर कहता है, 'यह सही नहीं है, और मैं इसके साथ नहीं खड़ा हो सकता.'