एक छोटे से कक्षा-कक्ष में बच्चे स्कूल के कार्यक्रम के लिए सजावट तैयार कर रहे थे। कागज़ की लड़ियाँ, रंगे हुए पोस्टर और मिट्टी के दीये कमरे को उत्साह से भर रहे थे। शिक्षिका ने बच्चों पर भरोसा किया था कि वे मिलकर सावधानी से काम करेंगे.
एक फीता उठाने के लिए हाथ बढ़ाते समय एक बच्चे से गलती से रंगा हुआ मिट्टी का दीया गिर गया। वह दो टुकड़ों में टूट गया। आवाज़ बहुत छोटी थी, लेकिन अचानक छाई चुप्पी में वह बहुत बड़ी लग रही थी.
एक पल के लिए बच्चे ने सोचा कि क्या वह ऐसे ही चुप रह सकता है और अनजान बन सकता है। किसी ने ठीक से देखा भी नहीं था. पीछे हट जाना आसान था. लेकिन भीतर की बेचैनी बढ़ती ही गई.
आखिर वह बच्चा शिक्षिका के पास गया और बोला, "मुझे क्षमा कीजिए, यह दीया मुझसे गलती से टूट गया।" शिक्षिका ने डाँटा नहीं। उन्होंने सच बताने के लिए बच्चे का धन्यवाद किया। दोनों ने मिलकर थोड़ी देर के लिए दीये को जोड़ने की कोशिश की, और एक दूसरे बच्चे ने स्कूल के बाद नया दीया बनाने में मदद करने की बात कही.
दिन के अंत तक टूटा हुआ दीया केवल एक गलती नहीं रहा; वह पूरी कक्षा के लिए एक सीख बन गया। सबने देखा कि सच बोलना एक पल के लिए कठिन लग सकता है, लेकिन वह मन को हल्का करता है और लोगों को साथ लाता है। इसलिए यह कहानी कोमलता से याद की जाती है: सत्य ने किसी को शर्मिंदा करके नहीं, बल्कि एक बच्चे को स्वीकार करने का साहस और दूसरों को दयालुता से उत्तर देने का अवसर देकर जीत हासिल की।