गोकुल के एक उजले दिन में सब कुछ सामान्य आनंद से भरा था। कहीं माखन मथा जा रहा था, कहीं बछड़ों को उनकी माताओं के पास बाँधा जा रहा था, और गलियों में बच्चे हँस रहे थे। बाल कृष्ण उस आनंद का केंद्र थे। वे स्नेह भरी बाँहों से दूसरी स्नेह भरी बाँहों में जाते, और पूरे गाँव को लगता मानो उन्हें देखकर ही दिन हल्का हो गया हो।
तभी हवा बदलने लगी। एक बेचैन झोंका पूरे गाँव में दौड़ा। धूल ज़मीन से उठी और सूखी पत्तियाँ गोल-गोल घूमने लगीं। जो दोपहर अभी तक शांत थी, वह अचानक अजीब और अस्थिर लगने लगी। पुरानी कथा इसे तृणावर्त के रूप में याद करती है, जो बवंडर बनकर आया था। परिवारों के लिए कही जाने वाली इस कथा में जोर डर पर नहीं, बल्कि इस बात पर है कि जब भ्रम और घबराहट आती है, तब लोग एक-दूसरे को कैसे संभालते हैं।
माएँ बच्चों को भीतर ले गईं। बड़े लोग एक-दूसरे को पुकारने लगे ताकि कोई अकेला न रह जाए। द्वारों को तेज़ हवा के विरुद्ध थामा गया। यशोदा कृष्ण को खोजती रहीं, और उनका हृदय प्रार्थना से भरा था। गोकुल के लोगों ने कोशिश की कि घबराहट हवा से भी अधिक न फैल जाए।
आंधी और ऊँची हुई। धूल ने आकाश को ढँक लिया और दिन धुँधला लगने लगा। सब कुछ अनिश्चित प्रतीत हो रहा था। लेकिन कथा कहती है कि कृष्ण स्वयं भय से अछूते रहे। जो शक्ति शोर और बल से जीतना चाहती थी, वह उनकी भीतरी शांति को छू भी न सकी। धीरे-धीरे बवंडर की ताकत घटने लगी। हवा नरम हुई। जब धूल बैठी, तब कृष्ण सुरक्षित मिले। यशोदा ने उन्हें बाँहों में भर लिया और पूरा गाँव राहत और कृतज्ञता से भर उठा।
उस दिन के बाद बड़ों ने एक गहरी बात समझी: तूफान केवल पेड़ों और छतों को नहीं हिलाता, वह यह भी परखता है कि लोग एक-दूसरे को कैसे थामते हैं। जब सब अलग-अलग दिशाओं में भागते हैं, तो भय बड़ा हो जाता है। लेकिन जब लोग पास रहते हैं, धीरे बोलते हैं और मदद करते हैं, तब कठिन समय भी बीत जाता है। यही कारण है कि यह कथा प्रिय है। यह बच्चों को सिखाती है कि उलझन भरे समय आते हैं, पर साहस हमेशा लड़ाई नहीं होता। कभी-कभी साहस का अर्थ है स्थिर रहना, ध्यान से सुनना और यह भरोसा रखना कि शांत हृदय तूफानी हवाओं से अधिक टिकते हैं।