उस वर्ष गर्मी कुछ अधिक ही कठोर थी. रास्ते धूल से भर गए, तालाब सिकुड़ गए, और लोगों ने हर घड़े को पहले से अधिक सावधानी से देखना शुरू कर दिया. गांव के बीच का पुराना कुआं सबकी आशा बन गया. पहले वही कुआं सामान्य जीवन का हिस्सा था. अब वही सबसे बड़ा प्रश्न था: क्या सबके लिए पर्याप्त पानी बचेगा?
शुरू में लोग केवल जल्दी आने लगे. फिर वे अधिक घड़े लाने लगे. कुछ ने डर के कारण जरूरत से ज्यादा भरना शुरू कर दिया. डर जल्दी फैलता है. इसलिए कुएं के पास की पंक्ति धीरे-धीरे पानी भरने की पंक्ति कम और चिंता की पंक्ति अधिक बन गई. लोगों ने एक-दूसरे के बर्तनों को गिनना शुरू कर दिया.
इस बदलाव को काव्या नाम की एक लड़की और उसके दादाजी ने ध्यान से देखा. दादाजी ने कहा, 'सूरज कुएं को सुखा सकता है, पर डर पूरे गांव को सूखा बना देता है.' काव्या ने यह बात मन में रख ली. अगले दिन उसने सुझाव दिया कि लोग घबराकर अलग-अलग बार आने के बजाय समय, मात्रा और प्राथमिकता मिलकर तय करें. पहले बुजुर्गों, बच्चों, पशुओं और रसोई के लिए पानी; फिर बाकी के लिए.
कुछ लोगों को यह नियम शुरू में कठिन लगा. पर धीरे-धीरे सबने उसमें राहत देखी. कुम्हार ने घड़ों पर रेखा खींच दी. शिक्षक ने बरगद के पास समय लिख दिया. जो परिवार ज्यादा भर लाए थे, उन्होंने थोड़ा वापस भी रखा. पानी अचानक बढ़ा नहीं, लेकिन बर्बादी कम हो गई. व्यवस्था ने वही बचाया जिसे डर खो देता है.
बारिश तुरंत नहीं आई. फिर भी कुआं बना रहा. उससे भी बड़ी बात यह कि गांव की मित्रता भी बनी रही. लोग फिर से एक-दूसरे के लिए रस्सी पकड़ने लगे. किसी ने थके हुए पड़ोसी को एक लोटा दिया. बच्चों ने सीखा कि साझा करना कमी नहीं बढ़ाता; वह कमी के समय सहारा बनता है. यही इस कहानी की सीख है: न्याय और सहयोग कई बार किसी भी भरे घड़े से अधिक मूल्यवान होते हैं.