गांव के किनारे रहने वाला आरिन हर काम का परिणाम जल्दी चाहता था. यदि वह कुछ बोए, तो अगले ही दिन अंकुर दिखना चाहिए. यदि कुछ सीखे, तो उसी शाम तक अच्छा हो जाना चाहिए. बड़े लोग जब कहते कि अच्छी चीजों को समय लगता है, तो वह सुन तो लेता, पर पूरी तरह मानता नहीं था.
एक दिन दादाजी के साथ आंगन साफ करते हुए उसे एक छोटा सा बीज मिला. दादाजी ने कहा, “यह पुराने नीम के पेड़ का बीज है. मैंने इसे इसलिए बचाकर रखा कि कभी कोई ऐसा वृक्ष उगाना चाहे जो दूसरों को छाया दे.” आरिन उत्साहित हुआ. उसी दिन दोनों ने कुएं के पास की सूखी मिट्टी में एक छोटा गड्ढा खोदा, बीज बोया और थोड़ा जल डाला.
अगले दिन आरिन दौड़कर देखने आया. कुछ भी नहीं था. तीसरे दिन भी नहीं. कुछ समय बाद वह चिढ़ गया. “शायद यह बेकार बीज है,” उसने कहा. दादाजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “तुम अपना काम करते रहो. बीज अपना काम कर रहा होगा.” यह उत्तर आरिन को संतोषजनक नहीं लगा. उसे प्रमाण चाहिए था, आंखों से दिखने वाला परिवर्तन चाहिए था.
फिर भी वह रोज थोड़ा जल डालता रहा. मिट्टी सख्त तो नहीं हो रही, यह देखता. ऊपर पड़े छोटे पत्थर हटाता. धीरे-धीरे उसने ऐसी बातें देखनी शुरू कीं जिन पर पहले उसका ध्यान ही नहीं गया था. नमी से मिट्टी का रंग कैसे बदलता है, धूप उसे कितनी जल्दी सुखा देती है, दीवार की छाया कहां अधिक ठहरती है. बीज के ऊपर आने से पहले आरिन के भीतर समझ उगने लगी.
फिर एक दिन बादल घिर आए. सूखी धरती पर वर्षा की गंध फैल गई. गांव के लोग आकाश की ओर देखने लगे. जब वर्षा आई, तो वह हड़बड़ी में नहीं आई. वह गहराई से, शांत गति से बरसी. दो दिन बाद आरिन ने मिट्टी को चीरती एक छोटी सी हरी रेखा देखी. वह बहुत बड़ी नहीं थी, पर उसके लिए वही सबसे सुंदर उत्तर था.
उसी क्षण उसे समझ आया कि बढ़ना हमेशा दिखाई देने से शुरू नहीं होता. कई सच्चे परिवर्तन पहले अदृश्य रहते हैं. जैसे बीज वर्षा की प्रतीक्षा कर रहा था, वैसे ही आरिन धैर्य सीखने की प्रतीक्षा कर रहा था. बाद में जब वृक्ष छाया देने लगा, तो आरिन को सबसे अधिक गर्व इस बात पर था कि उसने उन दिनों भी देखभाल छोड़ी नहीं, जब उसे कोई परिणाम दिख नहीं रहा था.