एक छोटे से गाँव में खबरें बैलगाड़ियों से भी तेज चलती थीं। सार्वजनिक कुएँ के पास एक पीतल की घंटी लटकी रहती थी, जिसे सभा, उत्सव, चेतावनी और मदद के समय बजाया जाता था। घंटी बजते ही सब लोग सुनते थे। इसलिए गाँव वाले उसे आदर से देखते थे। ध्वनि में शक्ति होती है, और शक्ति को सावधानी चाहिए।
एक मौसम ऐसा आया जब दोपहरें लंबी थीं, काम थकाने वाला था, और लोगों को कुछ नया सुनने की बेचैनी रहती थी। ऐसे समय आधा सुना वाक्य भी पूरा किस्सा बन जाता है। उसी समय नरेन नाम का एक तेज, चंचल और प्यारा लड़का दो बड़ों को अनाज, उधार और चिंता के बारे में धीरे-धीरे बात करते हुए सुन बैठा।
नरेन ने पूरी बात समझने के लिए ठहरना जरूरी नहीं समझा। उसने जितना सुना, वही उसे रोमांचक लगा। उसने सावधानी से पूछने या चुप रहने के बजाय उसका एक हिस्सा अपने मित्र से कह दिया। मित्र ने उसमें अनुमान जोड़ दिया। फिर वह बात कुएँ के पास पहुँची। शाम तक अफवाह बन चुकी थी कि एक सम्मानित दुकानदार ने लोगों को धोखा दिया है और सामान छिपा रखा है। सच बिल्कुल उल्टा था। देवन नाम का वही दुकानदार कठिन समय में परिवारों को उधार पर अनाज दिलाने की व्यवस्था कर रहा था।
अफवाह सूखी पत्तियों की तरह हवा में फैल गई। कुछ लोगों ने देवन को संदेह से देखना शुरू कर दिया। जो बच्चे पहले हँसते हुए दुकान में जाते थे, वे अब दरवाजे के पास ठिठकने लगे। नरेन ने देखा कि उसके कहे शब्द अब दूसरों के मुँह से लौट रहे हैं, पर बदले हुए रूप में। हर बार वे थोड़े और कठोर हो जाते थे। पहली बार उसे समझ आया कि लापरवाही से बोले गए शब्द बोलने वाले से भी बड़े हो सकते हैं।
शर्मिंदा होकर वह अपनी दादी के पास गया। दादी बहुत कम बोलती थीं, पर बहुत गहराई से समझती थीं। वे उसे कुएँ के पास लगी घंटी के पास ले गईं और बोलीं, "लोग इस घंटी का सम्मान क्यों करते हैं?" नरेन ने कहा, "क्योंकि यह बजती है तो सब सुनते हैं।" दादी ने कहा, "हाँ, और एक बार घंटी बज जाए तो उसकी आवाज को फिर धातु के भीतर वापस नहीं रखा जा सकता। शब्द भी ऐसे ही होते हैं। इसलिए उन्हें बाहर भेजने से पहले संभालना पड़ता है।"
दादी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने कहा, "पछतावा जरूरी है, लेकिन सुधार उससे भी जरूरी है।" अगले दिन सुबह नरेन ने वही घंटी बजवाई। लोग इकट्ठा हुए तो उसने स्वीकार किया कि उसने बिना समझे बात कही और एक असत्य को फैलाने में मदद की। फिर उसने सबके सामने देवन से क्षमा माँगी।
वह क्षण कठिन था, पर शुद्ध करने वाला भी। देवन ने शांति से सच्चाई समझाई और उदारता से क्षमा स्वीकार की। गाँव वालों को अपनी जल्दबाज़ी पर शर्म भी आई और राहत भी मिली। उन्हें लगा कि बिना जाँचे विश्वास करना कितना आसान है, और अपनी गलती खुले में मान लेना कितना साहसी काम है। उस दिन के बाद गाँव की घंटी केवल त्योहारों की नहीं, सचेत वाणी की भी याद बन गई।
यह कथा बच्चों और बड़ों दोनों को याद दिलाती है कि शब्द बहुत दूर तक जाते हैं। एक असावधान वाक्य किसी अच्छे नाम पर धूल जमा सकता है, रिश्तों को टेढ़ा कर सकता है और बिना वजह डर फैला सकता है। फिर भी आशा बची रहती है। जब सत्य साफ बोला जाए, क्षमा सच्चे मन से माँगी जाए, और समुदाय न्याय से सुने, तब भरोसा फिर उग सकता है। इसलिए आज भी गाँव में कोई जल्दी से कोई बात फैलाने लगे तो कोई बुज़ुर्ग बस इतना कह देता है, "घंटी को याद रखो।" वही सबक काफी होता है।