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⭐ नैतिक कथाएँ 👶 परिवार ⏱️ 8 मिनट पढ़ाई

वह दीपक जिसने अपना प्रकाश बाँटा

एक छोटी-सी ज्योति, एक अँधियारी बरसाती शाम और यह सीख कि बाँटने से प्रकाश घटता नहीं, बढ़ता है।

वह दीपक जिसने अपना प्रकाश बाँटा

विषय

साझा करना, समुदाय, दया और फैलती हुई रोशनी।

कहानी

खेतों के किनारे बसे एक छोटे गाँव में शामें शांत और परिचित हुआ करती थीं। पर एक बरसाती संध्या तेज़ आँधी और वर्षा ने कई घरों के दीप बुझा दिए। गलियाँ अँधेरी हो गईं। लोग सुरक्षित थे, फिर भी जाना-पहचाना गाँव भी कुछ क्षणों के लिए अनजान लगने लगा।

मीरा नाम की एक बच्ची अपनी दादी के साथ रहती थी। उनके घर का छोटा-सा मिट्टी का दीपक बच गया था। मीरा उसे अपने पास खींचे रही। दादी ने पूछा, 'इतना कसकर क्यों पकड़े हो?' मीरा ने कहा, 'अगर हम अपनी लौ बाँट देंगे तो क्या हमारी रोशनी कम नहीं हो जाएगी?' दादी ने कुछ नहीं कहा, बस दीपक को चौखट तक ले जाने को कहा।

वहीं से उन्होंने पड़ोसी का बुझा हुआ दीप जलाया। पहली लौ कम नहीं हुई। फिर दूसरी, तीसरी, चौथी ज्योति जली। धीरे-धीरे पूरी गली में रोशनी फैल गई। लोगों के चेहरे खुल गए, बच्चों का भय कम हुआ, और एक घर की मदद दूसरे घर तक पहुँचने लगी। मीरा ने अपनी आँखों से देखा कि प्रकाश बाँटने से घटा नहीं।

उस रात के बाद मीरा हर जगह वही पाठ याद रखने लगी। स्कूल में किसी को पढ़ाई समझाती, घर में छोटे को दिलासा देती, रास्ते में किसी की सहायता करती। उसे समझ में आया कि दया, ज्ञान और आशा भी दीपक की लौ की तरह हैं। उन्हें बचाने का सबसे सुंदर तरीका कभी-कभी उन्हें बाँटना ही होता है।

सीख

जब हम प्रकाश, ज्ञान या दया बाँटते हैं, तो वे घटते नहीं; वे और लोगों तक पहुँचते हैं।

सौम्य टिप्पणी

यह एक मूल, शांत और परिवार के साथ पढ़ी जा सकने वाली नैतिक कथा है।

वह दीपक जिसने अपना प्रकाश बाँटा
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⏱️ 8 मिथुन
⭐ नैतिक कथाएँ

वह दीपक जिसने अपना प्रकाश बाँटा

👶 परिवार ⏱️ 8 मिनट पढ़ाई
वह दीपक जिसने अपना प्रकाश बाँटा

🌟 विषय

साझा करना, समुदाय, दया और फैलती हुई रोशनी।

खेतों के किनारे बसे एक छोटे गाँव में शामें शांत और परिचित हुआ करती थीं। पर एक बरसाती संध्या तेज़ आँधी और वर्षा ने कई घरों के दीप बुझा दिए। गलियाँ अँधेरी हो गईं। लोग सुरक्षित थे, फिर भी जाना-पहचाना गाँव भी कुछ क्षणों के लिए अनजान लगने लगा।

मीरा नाम की एक बच्ची अपनी दादी के साथ रहती थी। उनके घर का छोटा-सा मिट्टी का दीपक बच गया था। मीरा उसे अपने पास खींचे रही। दादी ने पूछा, 'इतना कसकर क्यों पकड़े हो?' मीरा ने कहा, 'अगर हम अपनी लौ बाँट देंगे तो क्या हमारी रोशनी कम नहीं हो जाएगी?' दादी ने कुछ नहीं कहा, बस दीपक को चौखट तक ले जाने को कहा।

वहीं से उन्होंने पड़ोसी का बुझा हुआ दीप जलाया। पहली लौ कम नहीं हुई। फिर दूसरी, तीसरी, चौथी ज्योति जली। धीरे-धीरे पूरी गली में रोशनी फैल गई। लोगों के चेहरे खुल गए, बच्चों का भय कम हुआ, और एक घर की मदद दूसरे घर तक पहुँचने लगी। मीरा ने अपनी आँखों से देखा कि प्रकाश बाँटने से घटा नहीं।

उस रात के बाद मीरा हर जगह वही पाठ याद रखने लगी। स्कूल में किसी को पढ़ाई समझाती, घर में छोटे को दिलासा देती, रास्ते में किसी की सहायता करती। उसे समझ में आया कि दया, ज्ञान और आशा भी दीपक की लौ की तरह हैं। उन्हें बचाने का सबसे सुंदर तरीका कभी-कभी उन्हें बाँटना ही होता है।

💡 सीख

जब हम प्रकाश, ज्ञान या दया बाँटते हैं, तो वे घटते नहीं; वे और लोगों तक पहुँचते हैं।