वन के एक शांत कोने में शबरी का छोटा सा आश्रम था. उनके पास न राजमहल था, न बड़ी संपत्ति, न बाहरी गौरव. पर उनके हृदय में एक गहरी आशा थी. उनके गुरु ने कहा था कि एक दिन राम उनके आश्रम आएंगे. उसी दिन से शबरी के लिए हर सुबह केवल एक नई तिथि नहीं रही; वह तैयारी का नया अवसर बन गई.
वे रोज पथ साफ करतीं, जल भरकर रखतीं, बैठने की जगह सजातीं और वन से फल चुनकर लातीं. वे हर फल को ध्यान से देखतीं. जो मीठा और अच्छा लगे, वही अलग रखतीं. उनका स्वागत दिखावे का नहीं था. उसमें सावधानी, प्रेम और मन की पूरी उपस्थिति थी. वे किसी राजा की प्रतीक्षा नहीं कर रही थीं; वे उस करुणा की प्रतीक्षा कर रही थीं जिससे उनका मन पहले ही जुड़ चुका था.
समय बीतता गया. शायद कई लोगों को यह प्रतीक्षा लंबी लगी होगी. कोई पूछ सकता था, “जो अभी तक नहीं आया, उसके लिए इतनी तैयारी क्यों?” पर शबरी के लिए प्रतीक्षा खाली समय नहीं थी. वह साधना थी. पथ बुहारते हुए उनका मन भी निर्मल होता. फल चुनते हुए उन्हें लगता कि प्रेम का अर्थ केवल देना नहीं, ध्यान से देना भी है.
एक दिन राम और लक्ष्मण सचमुच वहां पहुंचे. शबरी की आंखें भर आईं. वर्षों की तैयारी उस क्षण में एकत्र हो गई. उन्होंने सादर फल अर्पित किए. पारिवारिक रूप में कही जाने वाली इस कथा में जोर किसी औपचारिकता पर नहीं, बल्कि शुद्ध भाव पर है. राम ने केवल फल नहीं स्वीकारे; उन्होंने शबरी के प्रेम, धैर्य और भक्ति को स्वीकारा.
यही इस कथा की सुंदरता है. शबरी महान इसलिए नहीं बनीं कि उनके पास कुछ बड़ा था. वे महान इसलिए बनीं कि उन्होंने साधारण को प्रेम से असाधारण बना दिया. वर्षों की प्रतीक्षा उनके भीतर कटुता नहीं, कोमलता बनाकर रखी. उन्होंने दिखाया कि जब हृदय तैयार रहता है, तो छोटा आश्रम भी सबसे सुंदर स्वागत-स्थल बन सकता है.
परिवार इस कथा को इसलिए बार-बार सुनाते हैं क्योंकि यह एक शांत सत्य कहती है. सच्चा स्वागत वैभव से नहीं, मन की सच्चाई से जन्मता है. धैर्य अगर प्रेम से जुड़ा रहे, तो वह बोझ नहीं बनता. शबरी की प्रतीक्षा हमें सिखाती है कि प्रेम से की गई तैयारी कभी व्यर्थ नहीं जाती.