दीवाली से जुड़ी सबसे प्रिय पारिवारिक कथाओं में से एक है राम की अयोध्या वापसी. यह केवल किसी राजकुमार के लौटने की कथा नहीं है. यह उस पूरे नगर की कथा है जो लंबे इंतज़ार से निकलकर प्रकाश में खिल उठता है. कठिन समय के बाद अच्छाई लौटे तो आनंद कैसे बढ़ता है, यही इसका हृदय है.
अयोध्या ने बहुत लंबा इंतज़ार किया था. जो राम से प्रेम करते थे, उन्होंने स्मृति और आशा को अपने भीतर सँभाले रखा. इंतज़ार मन को भारी बना सकता है. समय को लंबा कर सकता है. फिर भी इस कथा में प्रतीक्षा कटुता में नहीं, स्वागत में समाप्त होती है.
जैसे ही यह समाचार फैला कि राम, सीता और लक्ष्मण लौट रहे हैं, पूरे नगर में उत्साह फैल गया. घर साफ़ किए गए. रास्ते सजाए गए. दीप तैयार किए गए. कोई दीप केवल सजावट के लिए नहीं जला. हर ज्योति का अर्थ था: हम याद रखते हैं, हम आनंदित हैं, हम जो शुभ है उसका स्वागत करते हैं. एक दीप से दूसरा दीप, एक द्वार से दूसरा द्वार, और पूरा नगर उजाले से भर गया.
यही कारण है कि यह कथा बच्चों और बड़ों दोनों के लिए प्रिय है. दीवाली केवल बाहर की रोशनी नहीं है; भीतर लौटती स्पष्टता, प्रेम, साहस और मर्यादा की भी रोशनी है. लंबे इंतज़ार के बाद मिलने वाला स्वागत कितना सुंदर हो सकता है, यह अयोध्या के दीप बताते हैं. घर लौटना कभी-कभी सबसे गहरी खुशी बन जाता है.