एक दिन गोकुल के लोग अपने छोटे-छोटे कामों में लगे हुए थे। तभी एक अजनबी स्त्री गाँव में आई। उसका रूप सुंदर था, चाल शांत थी, इसलिए बहुतों ने सोचा कि वह कोई साधारण यात्री होगी।
पुरानी कथा में उसका नाम पूतना बताया जाता है। बाहर से वह स्नेह और देखभाल का रूप लेकर आई थी, पर उसका मन निर्मल नहीं था। परिवारों के लिए सुनाई जाने वाली इस कथा में बच्चों को डराने के बजाय एक सरल बात याद दिलाई जाती है: जो चीज़ बाहर से अच्छी लगे, वह हमेशा भीतर से सुरक्षित हो, यह ज़रूरी नहीं।
पूतना बाल कृष्ण के पास पहुँची, पर गोकुल में प्रकाश बनकर आए उस बालक की रक्षा पहले से ही थी। वह जो हानि लेकर आई थी, वह कृष्ण के निकट आते ही अपनी शक्ति खो बैठी। छल सच्चाई के सामने अधिक देर छिपा नहीं रह सका।
आसपास के लोगों ने जल्दी ही समझ लिया कि कृष्ण शांत हैं, सुरक्षित हैं, और भय से परे हैं। गाँव ने फिर महसूस किया कि ईश्वरीय कृपा कई बार मनुष्यों को सब समझ आने से पहले ही सुरक्षा दे देती है। इसके बाद बड़े लोग बच्चों की देखभाल और सावधानी से करने लगे।
आज जब परिवार यह कहानी सुनाते हैं, तो अंत में आश्वासन देते हैं: कृष्ण सुरक्षित रहे, प्रेम छल से अधिक शक्तिशाली रहा, और गोकुल के लोग इस अनुभव से अधिक समझदार बने। इसलिए यह कथा बच्चों को डर नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण सुरक्षा सिखाती है।