एक शांत आधी रात को, पहरेदारों से घिरी कारागार में शिशु कृष्ण का जन्म हुआ। हवा एक साथ स्थिर और उजली लग रही थी, मानो पूरी दुनिया उनका स्वागत करने के लिए ठहर गई हो।
वसुदेव ने देखा कि कारागार के द्वार कृपा से खुल गए हैं। उन्होंने बालक को सावधानी से कपड़े में लपेटा, हृदय से लगाया और बरसात भरी रात में चल पड़े। सामने नदी उफान पर थी, फिर भी रास्ता सुरक्षित बना रहा। उनकी बाँहों में लेटे बालक के लिए तूफान भी मानो कोमल हो गया।
नदी के उस पार गोकुल में एक और परिवार अनजाने में प्रतीक्षा कर रहा था। वसुदेव ने कृष्ण को प्रेम से यशोदा के पास सुलाया और सूर्योदय से पहले लौट आए। सुबह गाँव को बस इतना पता था कि एक सुंदर बालक आया है।
शुरू से ही कृष्ण की कथा यह याद दिलाती है कि कठिन स्थानों में भी प्रकाश जन्म ले सकता है और प्रेम भरी देखभाल परिवार को भय से पार ले जा सकती है।