वृंदावन में यमुना केवल नदी नहीं थी. वह बच्चों की हंसी, गायों की प्यास, और पूरे गांव की शांति से जुड़ी हुई थी. इसलिए जब उसके एक भाग का जल गहरा, भयावह और दूषित दिखने लगा, तो केवल एक स्थान नहीं बदला; पूरे समुदाय के मन का स्वर बदल गया. पक्षी उस ओर नहीं उतरते थे. पशु पीछे हट जाते थे. माताएं बच्चों को दूर रहने की चेतावनी देती थीं.
लोगों को पता था कि कालिय नाम का सर्प उन जलों में वास कर रहा है. उसका विष केवल पानी को नहीं, लोगों के मन को भी कठोर बना रहा था. कृष्ण ने यह देखा. वे वही बालक थे जिनकी हंसी से आंगन भर उठते थे, पर वे ऐसे भी थे जो भय को जीवन पर राज नहीं करने देते. वे यमुना के पास इसलिए गए कि दिखा सकें: जहां सब पीछे हटते हैं, वहां भी धर्म और साहस पहुंच सकते हैं.
परिवारों की कोमल कथावाचन शैली में सबसे प्रिय दृश्य वह है जब कृष्ण कालिय के फनों पर नृत्य करते हैं. यह क्रोध का नृत्य नहीं, नियंत्रण और कृपा का नृत्य है. उफनती हुई हिंसा उनके चरणों के नीचे लय पाती है. कालिय की शक्ति मिटती नहीं, नम्र होती है. यही इस कथा की गहराई है: ऊंचा साहस केवल शत्रु को हराने में नहीं, असंतुलन को व्यवस्था में बदलने में है.
जब कालिय झुकता है, तब कहानी और सुंदर हो जाती है. कृष्ण उसे नष्ट करने के लिए नहीं, हटाने के लिए कहते हैं, ताकि यमुना फिर सबकी हो सके. और तब नदी जैसे फिर से सांस लेने लगती है. गायें लौटती हैं. बच्चे फिर किनारे खेलते हैं. हवा में भय की जगह राहत भर जाती है. जीत का अर्थ केवल पराजय नहीं, पुनर्स्थापन भी है.
यही कारण है कि कालिय की कथा पीढ़ियों से सुनाई जाती है. इसमें रोमांच है, पर उससे भी अधिक आश्वासन है. सच्ची शक्ति केवल अंधकार को दबाती नहीं; वह जीवन को वापस उसके सही स्थान पर लाती है. जब यमुना फिर से बहती है, तब वृंदावन भी फिर से मुस्कुराता है.