बच्चे अक्सर हनुमान जी को सबसे पहले उनके बल के लिए पसंद करते हैं. उनके ऊँचे उड़ते हुए रूप, विशाल छलाँगें, वेग और साहस सबको आकर्षित करते हैं. लेकिन परिवारों में सुनाई जाने वाली गहरी शिक्षा यह भी है कि हनुमान जी की शक्ति केवल बड़ी नहीं थी, वह संयमित भी थी. वह अनियंत्रित बल नहीं था; वह धर्म की सेवा के लिए जाग्रत शक्ति थी.
हनुमान जी जानते थे कि कब तेज़ी से कार्य करना है, कब चुपचाप देखना है, कब कोमलता से बोलना है और कब दृढ़ रहना है. इसी कारण उनका बल भय नहीं, भरोसा देता है. बिना अनुशासन के सामर्थ्य शोर बन सकता है. बिना विनम्रता के शक्ति खतरनाक भी हो सकती है. पर जब बल पर संयम हो, तब वही शक्ति रक्षा बनती है.
परिवार इस शिक्षा को बच्चों के लिए बहुत सरल ढंग से समझाते हैं. ऊँची आवाज़ हमेशा सबसे मजबूत आवाज़ नहीं होती. तेज़ भागना हमेशा समझदारी नहीं होता. सच्ची शक्ति में स्वयं पर नियंत्रण भी होता है. वह सुनती है, रुकती है, सोचती है, और फिर सही समय पर काम करती है. हनुमान जी की महानता इसी में है कि उनकी ऊर्जा उन्हें नहीं चलाती थी; उनकी भक्ति उसे दिशा देती थी.
इसलिए हनुमान जी बढ़ते बच्चों के लिए अद्भुत आदर्श हैं. किसी बच्चे में बहुत ऊर्जा हो सकती है, गहरी भावना हो सकती है, जल्दी करने की चाह हो सकती है. यह सब बुरा नहीं है. लेकिन जब इनमें अनुशासन, आदर और जिम्मेदारी जुड़ते हैं, तभी ये गुण आशीर्वाद बनते हैं. हनुमान की कथा मानो कहती है: "अपने बल को उपयोगी बनाओ, अपने गुणों को जिम्मेदार बनाओ."
इसीलिए हनुमान जी की कथा उत्साह भी देती है और शांति भी. वे वीर हैं, पर अव्यवस्थित नहीं. वे शक्तिशाली हैं, पर घमंडी नहीं. वे निडर हैं, पर लापरवाह नहीं. अनुशासन दंड नहीं है; वह सही दिशा है. उसी से शक्ति सेवा बनती है, साहस संरक्षण बनता है, और सामर्थ्य वरदान बनता है.