रामायण के एक महत्त्वपूर्ण चरण में सीता की खोज राम के मित्रों को विराट सागर के किनारे ले आई। लहरें दूर-दूर तक फैली थीं और उनके पार लंका थी। कार्य स्पष्ट था: किसी एक को समुद्र पार कर सीता को खोजना था और सत्य समाचार लेकर लौटना था। लेकिन क्या करना है यह जानना और कौन कर सकेगा यह समझना एक बात नहीं होती।
कुछ समय तक सब अनिश्चित खड़े रहे। प्रत्येक वानर वीर अपनी सीमा जानता था। कोई दूर तक छलांग लगा सकता था, पर उतनी दूर नहीं। किसी में उत्साह था, पर आवश्यक आत्मविश्वास नहीं। यह कार्य अनुमान पर नहीं छोड़ा जा सकता था। इसके लिए बल, बुद्धि और ऐसा हृदय चाहिए था जो सेवा से दृष्टि न हटाए।
तभी ज्ञानी वृद्ध जाम्बवान ने हनुमान की ओर देखा। उन्होंने उन्हें एक गहरी बात याद दिलाई: कभी-कभी महान सामर्थ्य हमारे भीतर शांत पड़ा रहता है, जब तक कोई विश्वास के साथ उसे पुकार न दे। हनुमान दुर्बल नहीं हुए थे। वे विनम्र हो गए थे और अपनी पूरी क्षमता को भूल बैठे थे। जब भक्ति मार्ग दिखाती है, तब क्या संभव है, यह उन्हें फिर से सुनना था।
इन वचनों ने उन्हें जगा दिया। हनुमान और ऊँचे खड़े हुए। उनका मन निर्मल हो गया। वे अहंकार की छलांग नहीं, उद्देश्य की छलांग के लिए तैयार हो रहे थे। उन्होंने भीतर ही भीतर राम को प्रणाम किया, अपनी शक्ति समेटी और अपने पूरे अस्तित्व को एक पवित्र लक्ष्य पर केंद्रित कर दिया: सेवा को उत्तम रीति से पूरा करना।
फिर वह छलांग आई। कथाएँ उसे तेजस्वी और महान क्षण के रूप में याद करती हैं। हनुमान ऐसे उछले मानो स्वयं धरती ही उन्हें आगे बढ़ने का आशीर्वाद दे रही हो। नीचे अथाह समुद्र फैला था और यात्रा सरल नहीं थी। मार्ग में धैर्य, बुद्धि और एकाग्रता की परीक्षाएँ आईं। कुछ चुनौतियाँ विनम्रता से सुलझीं। कुछ के लिए तीव्र विवेक चाहिए था। हर परीक्षा यह सिखाती चली गई कि साहस केवल आगे बढ़ जाने का नाम नहीं है; सही ढंग से प्रतिक्रिया करना भी साहस का ही भाग है।
जब हनुमान अंततः लंका पहुँचे, तो वे गर्व के साथ नहीं पहुँचे। वे अनुशासन के साथ पहुँचे। उन्होंने विशाल दूरी पार कर ली थी, फिर भी उनका ध्येय स्पष्ट बना रहा। उन्हें वहाँ ढूँढ़ना था, देखना था, आश्वासन देना था, और लौटना था। उस महाछलांग की महानता केवल उसके आकार में नहीं थी, बल्कि इस बात में थी कि उन्होंने शक्ति को जिम्मेदारी के साथ सँभाला।
परिवार इस कथा को इसलिए प्रेम से याद रखते हैं क्योंकि यह उन क्षणों की बात करती है जिन्हें बच्चे और बड़े दोनों समझते हैं। कभी कोई चुनौती हमारी सोच से कहीं बड़ी लगती है। कभी हम किसी कठिन कार्य के तट पर खड़े होकर स्वयं को छोटा महसूस करते हैं। ऐसे समय में प्रोत्साहन महत्त्व रखता है। स्मरण महत्त्व रखता है। श्रद्धा महत्त्व रखती है। सही समय पर बोले गए सच्चे शब्द भीतर छिपे साहस को जगा सकते हैं।
इसलिए हनुमान की यह छलांग केवल वीरता का दृश्य नहीं है। यह उस पहचान का पाठ है जो सेवा की पुकार पर जागती है। यह सिखाती है कि भक्ति बिखरी शक्ति को एकत्र कर सकती है, कि महान उद्देश्य से जुड़ने पर साहस बढ़ता है, और कि जब हृदय, बुद्धि और ध्येय साथ चलें, तब बड़े से बड़ा अंतर भी पार किया जा सकता है।