हनुमान की महानता का स्मरण करते समय हम अक्सर उनकी शक्ति को याद करते हैं। समुद्र लाँघना, पर्वत उठाना, निर्भीक वेग से चलना। पर अशोक वाटिका में सीता को ढूँढने की कथा उनका एक और रूप दिखाती है: सच्चा बल जानता है कि कब कोमल बनना है।
लंका की लंबी खोज के बाद हनुमान अशोक वाटिका पहुँचे जहाँ सीता विराजमान थीं। चारों ओर वृक्ष, फूल और हवा थी, पर वातावरण में गहरा दुख भी था। सीता को देखते ही हनुमान सामने नहीं आए। उन्होंने समझा कि भयभीत हृदय को अचानक उपस्थिति नहीं, सुरक्षा की अनुभूति चाहिए। इसलिए वे पहले देखते रहे, फिर विचार किया कि कैसे बोलना उचित होगा।
उन्होंने आदर से राम का स्मरण कराया और फिर राम की अंगूठी प्रस्तुत की। वह अंगूठी केवल आभूषण नहीं थी; वह स्मृति, संबंध और आश्वासन थी। उसने कहा कि राम ने सीता को भुलाया नहीं है। सहायता मार्ग में है। आशा समुद्र पार करके पहुँच चुकी है।
यही इस कथा की गहराई है। हनुमान अपनी वीरता का प्रदर्शन नहीं करते; वे सांत्वना पहुँचाते हैं। बच्चों को यह कथा सिखाती है कि साहस केवल ऊँची आवाज़ नहीं होता। कई बार साहस का अर्थ है धैर्य रखना, सामने वाले के मन को समझना और करुणा से भरा सत्य कहना।