हनुमान जी की कथाओं में हम अक्सर गति, वीरता और बड़े कार्य देखते हैं. ऊँची छलाँगें, दूर की यात्राएँ, कठिन दायित्व. लेकिन परिवार उन्हें एक और कारण से भी प्रिय मानते हैं. उनकी महानता केवल बड़े क्षणों में नहीं थी; वह निरंतर भक्ति में भी थी. उनका हृदय हमेशा धर्म और सेवा की ओर मुड़ा रहता था. इसी कारण उनकी शक्ति परिस्थितियों के बदलने पर भी कम नहीं होती थी.
यही कारण है कि हनुमान जी दैनिक प्रेरणा बने रहते हैं. भक्ति केवल विशेष अवसरों पर उठने वाला भाव नहीं है. वह जीवन जीने का ढंग है. जो सचमुच महत्वपूर्ण है उसे याद रखना, बार-बार उसी की ओर लौटना, और अपने कार्यों को उसी से दिशा देना ही भक्ति है. हनुमान जी जब सेवा करते थे, तो यह नहीं देखते थे कि वह कार्य कितना बड़ा या प्रभावशाली लगेगा. वे यह देखते थे कि वह आवश्यक है या नहीं.
परिवार बच्चों को यह बात बहुत सरल रूप में समझाते हैं. घर में बिना बार-बार कहे मदद करना भी एक छोटी भक्ति है. कठिनाई में भी ईमानदारी से पढ़ना एक छोटी भक्ति है. व्यस्त होने पर भी दयालु बने रहना एक छोटी भक्ति है. बाहर से यह सब साधारण लग सकता है, पर यही छोटी निष्ठाएँ चरित्र बनाती हैं.
इसलिए हनुमान जी की शक्ति भरोसेमंद लगती है. वह अहंकार से नहीं, प्रेम से आती है. वे प्रशंसा के लिए सेवा नहीं करते. सुविधा के समय ही मदद नहीं करते. इसलिए परिवार कहते हैं कि यदि हनुमान जी जैसा बल चाहिए, तो हनुमान जी जैसा हृदय भी चाहिए. भक्ति ही सामर्थ्य को सुंदर बनाती है. वही प्रयास को सेवा और रोज़मर्रा के काम को चरित्र में बदल देती है.