हनुमानजी की सबसे प्रिय कथाओं में से एक वह है जब उन्होंने समय पर उपचार पहुँचाने के लिए पूरा पर्वत उठा लिया। परिवार इस प्रसंग को केवल शक्ति के प्रदर्शन के रूप में याद नहीं करते। वे इसे सेवा के उज्ज्वल उदाहरण के रूप में देखते हैं। जब किसी को तुरंत सहायता चाहिए थी, तब हनुमानजी ने भ्रम या विलंब को बीच में आने नहीं दिया.
कथा कहती है कि जीवन बचाने वाली औषधि प्रभात से पहले पहुँचनी थी। जिस पर्वत पर वह औषधि उगती थी, वहाँ जाने का कार्य हनुमानजी को मिला। उन्होंने यह नहीं पूछा कि यात्रा कठिन होगी या नहीं। उन्होंने अपने साहस की प्रशंसा में समय नहीं गँवाया। सेवा आवश्यक थी, बस यही उनके लिए पर्याप्त कारण था आगे बढ़ने का.
पर्वत तक पहुँचने के बाद एक और कठिनाई सामने आई। जल्दी और अँधेरे में निश्चित रूप से पहचानना सरल नहीं था कि कौन-सी औषधि वही है जिसकी आवश्यकता है। बहुत से लोग यहीं रुक जाते। वे सोचते, “मैं इतना दूर आया, पर पूरी तरह सही पहचान न होने से अब खाली हाथ लौटना होगा।” हनुमानजी ने वैसा नहीं किया.
उन्होंने अनिश्चितता को कार्य पर भारी नहीं पड़ने दिया। इसके बजाय पूरा पर्वत ही उठा लिया। यही इस कथा की सबसे गहरी सुंदरता है। सच्ची सेवा केवल आदर्श परिस्थितियों का इंतज़ार नहीं करती। जब उद्देश्य पवित्र हो और आवश्यकता वास्तविक हो, तब समर्पित प्रयत्न रास्ता बना लेता है। हनुमानजी ने सबसे छोटा प्रयास नहीं चुना; उन्होंने सबसे निश्चित सहायता चुनी.
जब पर्वत पहुँचा, तो चिंतित हृदयों में आशा लौट आई। राहत फैल गई। परिवार इस कथा को इसलिए संजोते हैं क्योंकि इसमें हनुमानजी का बल करुणा से अलग नहीं है। वे शक्तिशाली थे, पर उनकी शक्ति का सौंदर्य इस बात में था कि उसे उन्होंने रक्षा, उपचार और सहारे के लिए उपयोग किया.
इस कथा की सीख बच्चों और बड़ों दोनों के लिए निकट की है। हर किसी को पर्वत नहीं उठाना होगा। पर ऐसे क्षण सबके जीवन में आते हैं जब किसी को जल्दी सहायता चाहिए होती है। तब यह कहना कि “सब कुछ पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है” पर्याप्त नहीं होता। अधिक प्रेमपूर्ण उत्तर यह है: “मैं जितना अच्छा कर सकता हूँ, उतना अवश्य करूँगा।” यही हनुमानजी की सेवा आज भी प्रेरणा देती है.
इसलिए हनुमान और पर्वत की छवि केवल चमत्कार नहीं है। यह स्मरण दिलाती है कि जब आवश्यकता सच्ची हो, तो पूरे मन से सहायता पहुँचाओ। सेवा को पूर्ण परिस्थिति नहीं चाहिए; उसे सत्यनिष्ठ हृदय और तत्पर हाथ चाहिए.