कुछ कथाएँ बच्चों को पहले चमत्कार लगती हैं और बाद में जीवन का मार्गदर्शन बन जाती हैं। गणेश द्वारा महाभारत लिखने की कथा ऐसी ही है। महर्षि व्यास ने एक विशाल महाकाव्य रचा जिसमें धर्म, प्रश्न, दुख, साहस और मानवीय जिम्मेदारी सब कुछ समाया था। इतनी बड़ी रचना को सुनकर समझना और बिना चूक लिखना किसी साधारण काम जैसा नहीं था।
इसलिए व्यास ने गणेश को आमंत्रित किया। गणेश ने सहर्ष स्वीकार किया, पर एक शर्त रखी कि व्यास बिना रुके बोलें। व्यास ने भी कहा कि गणेश प्रत्येक श्लोक को पूरी तरह समझकर ही लिखें। यह कथा का सबसे सुंदर भाग है, क्योंकि यहाँ गति और समझ एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साथी बनते हैं।
फिर लेखन आरंभ हुआ। व्यास बोलते गए, गणेश सुनते गए, समझते गए और लिखते गए। परंपरा कहती है कि एक समय उनका लेखन-उपकरण टूट गया। बहुत लोग वहीं रुक जाते, पर गणेश ने अपना दंत ही लेखनी बना लिया ताकि कार्य रुक न जाए। यही दृश्य बच्चों के मन में सबसे गहरा उतरता है: योग्य काम के सामने असुविधा हार का कारण नहीं बनती।
यह कथा हमें बताती है कि पढ़ना, लिखना, ध्यान लगाना और किसी बड़े कार्य के लिए धैर्य रखना साधारण गुण नहीं हैं। गणेश केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि ऐसे आदर्श भी हैं जो सिखाते हैं कि सच्ची बुद्धि सेवा करती है, समझती है और कठिनाई आने पर भी काम अधूरा नहीं छोड़ती।