गणेशजी के स्वरूप में बच्चों की नज़र सबसे पहले जिन बातों पर जाती है, उनमें एक है उनका टूटा हुआ दंत। वे पूछते हैं, विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता को ऐसा क्यों दिखाया जाता है? परिवार इस प्रश्न का उत्तर किसी दुखभरी कथा से नहीं, बल्कि समर्पण और सेवा की कथा से देते हैं.
एक प्रसिद्ध परंपरा कहती है कि व्यासजी एक महान ज्ञानग्रंथ का उच्चारण करने वाले थे। उसके शब्द गहरे थे, उसका अर्थ सूक्ष्म था, और उसे बिना लापरवाही के लिखा जाना था। ऐसा लेखक चाहिए था जो ध्यान से सुन सके और निष्ठा से लिख सके। गणेशजी ने यह कार्य स्वीकार किया। वे जानते थे कि यह साधारण काम नहीं, बल्कि पूरी गंभीरता माँगने वाला पवित्र दायित्व है.
जब लेखन आरंभ हुआ, तो वचनों का प्रवाह रुकने वाला नहीं था। तभी लिखने का साधन पर्याप्त नहीं रहा। यहीं इस कथा की सुंदरता प्रकट होती है। गणेशजी क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने काम नहीं छोड़ा। उन्होंने यह नहीं कहा कि असुविधा आने पर सेवा रुक जानी चाहिए। इसके बजाय उन्होंने अपना ही एक दंत लेखनी बना लिया, ताकि पवित्र कार्य बिना रुकावट आगे बढ़ सके.
इसीलिए यह कथा टूटन से अधिक समर्पण की कथा है। जो चीज रूप का एक भाग थी, वही एक महान कार्य का साधन बन गई। अपूर्णता हमेशा कमी नहीं होती; कई बार वही इस बात का प्रमाण बनती है कि हमने किसी श्रेष्ठ काम के लिए स्वयं को अर्पित किया। गणेशजी का टूटा दंत लज्जा का चिह्न नहीं, धैर्य और समर्पण का चिह्न है.
बच्चे इस शिक्षा को बहुत सहजता से समझते हैं। फटा हुआ खिलौना भी प्रिय हो सकता है। सिली हुई किताब भी सुंदर विचार सँभाल सकती है। गलती एक सीख बन सकती है। कठिन दिन धैर्य का आरंभ बन सकता है। गणेशजी हमें सिखाते हैं कि बाहरी पूर्णता से अधिक महत्त्वपूर्ण है भीतर का उद्देश्य.
इसलिए टूटे दंत की कथा पीढ़ियों तक प्रिय बनी रही है। जब जीवन में कुछ बदल जाए या टूट जाए, तो क्या उसे छिपाना चाहिए, या यह देखना चाहिए कि उसने हमें क्या सिखाया? गणेशजी की कथा दूसरा रास्ता दिखाती है. यदि बुद्धि, सेवा और प्रेम साथ हों, तो टूटन भी आशीर्वाद का रूप ले सकती है.