बहुत से घरों में जब गणेश जी के सामने मोदकों की थाली सजती है, तो बच्चे पूछते हैं, "गणेश जी को मोदक इतना प्रिय क्यों है?" यह प्रश्न केवल स्वाद का नहीं है. परिवारों में सुनाई जाने वाली कथाएँ बताती हैं कि मोदक उस मिठास का प्रतीक है जो प्रेम, धैर्य और समझ से आती है.
एक प्रिय पारिवारिक कथा में माता पार्वती बड़े प्रेम से ताज़े मोदक बनाती हैं. रसोई में सुगंध भर जाती है. चावल के आटे का कोमल आवरण, भीतर भरा मीठा सार, और हर मोदक में लगी सावधानी उसे साधारण भोजन से अधिक बना देती है. गणेश जी जब उसे देखते हैं, तो वे केवल स्वादिष्ट प्रसाद नहीं देखते; वे उसमें लगा स्नेह पहचानते हैं.
फिर एक सुन्दर प्रश्न उठता है: पहला मोदक किसे मिले? कुछ कहानियाँ बताती हैं कि वह उसी को मिलना चाहिए जो उसकी असली महत्ता को समझे. गणेश जी मोदक को देखकर जानते हैं कि बाहर से वह सरल है, पर भीतर वह गहराई से भरा है. ठीक वैसे ही जैसे सच्चा ज्ञान होता है. वह बाहर से दिखावे वाला नहीं होता, पर भीतर से पोषण देता है.
कथा यहीं पर और सुंदर हो जाती है. गणेश जी आनंद को अपने तक नहीं रखते. सच्चा प्रसाद बाँटने से और पवित्र होता है. इसलिए मोदक लोभ का नहीं, कृतज्ञता और साझेदारी का प्रतीक बन जाता है. बच्चों के लिए यह संदेश बहुत कोमल है: सबसे मधुर वस्तु वह नहीं जो तुरंत पकड़ ली जाए, बल्कि वह है जो प्रेम से बनाई जाए, विनम्रता से स्वीकार की जाए और खुशी से बाँटी जाए.