जब बच्चे गणेश जी की तस्वीरें देखते हैं, तो एक बात उन्हें तुरंत मुस्कुराने पर मजबूर करती है. इतने महान, शांत और बुद्धिमान गणेश जी के पास एक छोटा सा मूषक होता है. यह अंतर ही प्रश्न बन जाता है: इतनी बड़ी महिमा वाला देवता इतने छोटे साथी को क्यों चुनता है? यही प्रश्न इस कथा का सुंदर द्वार है.
एक उत्सव के दिन सजे हुए आंगन में अनेक जीव और अतिथि आए. कोई अपनी शक्ति दिखाना चाहता था, कोई अपनी गति, कोई अपनी ऊंची आवाज. छोटा मूषक चुपचाप किनारे खड़ा रहा. बहुतों ने उसे देखा भी नहीं. कुछ ने हंसकर कहा, “इतना छोटा होकर यह क्या करेगा?” लेकिन गणेश जी ने उसे अनदेखा नहीं किया.
मूषक ने वे सब बातें देखीं जो बड़े और व्यस्त लोग चूक गए. एक गिरा हुआ फूल उसने वेदी के पास पहुंचा दिया. उलझी हुई डोरी को उसने खोल दिया. एक छोटी घंटी लुढ़ककर मेज के नीचे चली गई तो वही उसे ढूंढ लाया. वह किसी की प्रशंसा पाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए सहायता कर रहा था क्योंकि सहायता की जरूरत थी.
तब गणेश जी ने सबको पास बुलाकर पूछा, “क्या छोटा होने का अर्थ यह है कि किसी का मूल्य भी छोटा हो?” सभी शांत हो गए. गणेश जी ने समझाया कि संसार केवल बड़े कार्यों से नहीं चलता. बहुत कुछ उन शांत, सावधान और विश्वसनीय हाथों से भी चलता है जिन्हें अक्सर लोग देख नहीं पाते. उपयोगिता हमेशा आकार से नहीं मापी जाती.
उस दिन के बाद लोगों की हंसी बदल गई. वह उपहास नहीं रही; वह अपनापन बन गई. बच्चों ने मूषक को नया सम्मान दिया. और यही इस कहानी की सबसे प्यारी सीख है: छोटे साथी को कभी कम मत समझो. कई बार वही वहां पहुंचता है जहां बड़े नहीं पहुंच सकते. नम्र सहायता ही अक्सर सबसे टिकाऊ सहायता होती है.