गोकुल में बालकृष्ण की लीला कभी साधारण नहीं होती थी. उनकी शरारतें भी ऐसी थीं कि घर-घर में हँसी के साथ सुनाई जाती थीं. मक्खन लेना, भाग जाना, मुस्कुराकर सबका मन जीत लेना. लेकिन दामोदर लीला केवल इसीलिए प्रिय नहीं है कि कृष्ण शरारती थे. यह इसलिए भी प्रिय है क्योंकि यह प्रेम की शक्ति को बहुत सुंदर ढंग से दिखाती है.
एक दिन यशोदा ने सोचा कि कृष्ण को थोड़ा प्रेमभरा अनुशासन चाहिए. वह कठोर क्रोध में नहीं थीं. वह एक ऐसी माँ थीं जो अपने चंचल, मनमोहक बच्चे को थोड़ा ठहरना सिखाना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने उन्हें थोड़ी देर के लिए ओखली से बाँधने की कोशिश की. पर हर बार रस्सी थोड़ी छोटी पड़ जाती. एक टुकड़ा और जोड़ा गया. फिर भी थोड़ी कमी. फिर एक और. फिर भी उतनी ही कमी.
परिवार इस भाग को बड़े प्रेम से सुनाते हैं, क्योंकि इसमें कोमल हास्य भी है और रहस्य भी. यशोदा ने हार नहीं मानी. उनके बाल ढीले हो गए, हाथ थक गए, साँस तेज़ हो गई, फिर भी वे लगी रहीं. यह शक्ति की ज़िद नहीं थी. यह स्नेह का धैर्य था. वह अपने बच्चे को दबाना नहीं चाहती थीं; उसे प्रेम से दिशा देना चाहती थीं.
अंत में परंपरा कहती है कि कृष्ण ने स्वयं को बँधने दिया. तभी इस लीला का हृदय खुलता है: जिसे कुछ भी बाँध नहीं सकता, वह भी माँ के प्रेम से बँध गया. इसी से 'दामोदर' नाम इतना प्रिय है. यहाँ रस्सी डर का प्रतीक नहीं है. यह संबंध का प्रतीक है. प्रेम मार्ग दिखा सकता है, रोक सकता है, सुधार सकता है, और फिर भी विश्वास को टूटने नहीं देता.