एक व्यस्त मोहल्ले में बच्चे रोज़ शाम को घरों के बीच बने खुले स्थान पर खेलते थे. वहाँ हँसी रहती थी, दौड़भाग रहती थी, और छोटे-बड़े सब मिलकर समय बिताते थे. लेकिन एक सप्ताह ऐसा हुआ कि एक बड़ा बच्चा छोटे बच्चों से बहुत तेज़ और दबाव भरे तरीके से बात करने लगा. वह हमेशा चिल्लाता नहीं था, पर उसके शब्दों में ऐसा जोर था कि छोटे बच्चे पीछे हटने लगे और अपने ही खेल से दूर होने लगे.
एक छोटे बच्चे ने यह सब देखा और मन ही मन परेशान हुआ. उसे साफ दिख रहा था कि यह ठीक नहीं है. फिर भी डर था कि अगर कुछ कहा, तो झगड़ा और बढ़ जाएगा. कुछ दिनों तक वह चुप रहा. लेकिन चुप रहने से खेल का मैदान और अच्छा नहीं हुआ. एक शाम वह घर जाकर अपनी बुआ से बोला, "गलत बात के सामने खड़ा कैसे हों, बिना गुस्सा किए?"
बुआ ने बहुत सरल उत्तर दिया: "साहस को कठोर आवाज़ नहीं चाहिए, स्थिर आवाज़ चाहिए." उन्होंने समझाया कि क्रोध हमें कुछ क्षणों के लिए शक्तिशाली महसूस करा सकता है, लेकिन शांत साहस अक्सर स्थिति को अधिक सच्चाई से बदलता है. सही बात कहने के लिए अपमान ज़रूरी नहीं होता. कभी-कभी स्पष्ट और सम्मानजनक शब्द सबसे गहरा असर छोड़ते हैं.
अगले दिन जब वही बड़ा बच्चा फिर अनुचित ढंग से आगे बढ़ा, तो छोटे बच्चे ने शांत होकर कदम आगे रखा. उसने ऊँची आवाज़ नहीं की. उसने बस इतना कहा, "सबको मौका मिलेगा. तुम बड़े हो, लेकिन खेल केवल तुम्हारा नहीं है." कुछ पल के लिए सब शांत हो गए. शब्द तीखे नहीं थे, पर इतने स्पष्ट थे कि बात रुक गई. फिर एक और बच्चे ने हामी भरी, फिर दूसरे ने. जो असहजता अकेली लग रही थी, वह बहुतों की साझा भावना निकली.
उस दिन के बाद खेल का माहौल बदलने लगा. बड़ा बच्चा एक ही दिन में पूरी तरह नहीं बदला, लेकिन सीमा स्पष्ट हो गई. छोटे बच्चों में आत्मविश्वास आया. जिसने बात कही थी, उसने यह सीखा कि साहस और क्रोध एक ही बात नहीं हैं. कई बार शांत सत्य, गुस्से से अधिक मजबूत होता है. इसी कारण ऐसी कथाएँ परिवारों में सँभाल कर रखी जाती हैं: कोमलता कमजोरी नहीं है, और बिना क्रोध के भी न्याय की रक्षा की जा सकती है.