जब लंका की ओर समुद्र पार करने का समय आया, तो राम के साथियों के सामने खड़ा दृश्य लगभग असंभव सा लगता था. एक ओर वे थे जो सहायता के लिए तैयार थे, दूसरी ओर वह स्थान जहाँ पहुँचना ज़रूरी था. समुद्र चौड़ा था, लहरें बेचैन थीं, और कार्य बहुत बड़ा था. फिर भी रामायण का यह प्रसंग निराशा की कहानी बनकर नहीं, बल्कि मिलकर काम करने की प्रेरणा बनकर याद किया जाता है.
इस सेतु को किसी एक ने अकेले नहीं बनाया. यही इसकी सबसे बड़ी सुंदरता है. कुछ बहुत बलवान थे और बड़े पत्थर उठा सकते थे. कुछ पेड़ और लकड़ियाँ लाते थे. कुछ रास्ता साफ करते थे. कुछ देखते थे कि क्या कहाँ रखा जाए. सेवा का रूप सबका अलग था, लेकिन किसी का भी प्रयास व्यर्थ नहीं था. यही कारण है कि यह कथा केवल पराक्रम की नहीं, सहयोग की भी कथा है.
परिवारों में प्रेम से सुनाई जाने वाली एक प्यारी बात गिलहरियों की भी है. बड़े-बड़े पत्थरों के सामने उनका काम बहुत छोटा लगता था. लेकिन वे रेत में लोटतीं और अपने छोटे शरीर पर लगी रेत को सेतु पर झाड़ देतीं. उनकी यह छोटी मदद हमें एक गहरी बात सिखाती है: जब उद्देश्य अच्छा हो, तो सच्चा छोटा योगदान भी बड़ा हो जाता है. बच्चों को यह बात तुरंत समझ आती है.
राम की उपस्थिति ने पूरे काम को दिशा दी. सबको पता था कि यह काम दिखावे के लिए नहीं है. यह धर्म के लिए है, किसी ज़रूरतमंद तक पहुँचने के लिए है, आशा को आगे बढ़ाने के लिए है. यही साझा उद्देश्य सबकी ऊर्जा को एक साथ बाँधता गया. पत्थर पर पत्थर, मुट्ठी भर रेत पर मुट्ठी भर रेत, रास्ता समुद्र पर उभरने लगा.
इसलिए यह कथा घरों, विद्यालयों और समुदायों में बार-बार सुनाई जाती है. बड़ी दूरी तब पार होती है जब बहुत से लोग अपने-अपने सामर्थ्य से एक अच्छा काम सँभालते हैं. मज़बूत हाथ भी ज़रूरी हैं, सावधान हाथ भी, छोटे पंजे भी. अच्छे उद्देश्य के सामने कोई योगदान छोटा नहीं होता. यही सेतु की सच्ची शिक्षा है.