रामायण के सबसे शांत और सबसे गहरे प्रसंगों में एक भरत और राम की पादुकाओं की कथा है। इसमें युद्ध का शोर नहीं, बल्कि चरित्र की आभा है। भरत के सामने राज्य था, पर हृदय में प्रसन्नता नहीं थी। उनके लिए सबसे बड़ा सत्य यह था कि राम ही उचित स्थान के अधिकारी थे।
भरत राम के पास इसलिए गए कि वे उन्हें वापस अयोध्या ले आएँ। पर राम ने धर्म के मार्ग से हटना स्वीकार नहीं किया। वनवास पूरा करना ही उनका निश्चय था। यह भरत के लिए कठिन क्षण था। वे चाहें तो राज्य ले सकते थे, पर उन्होंने पीड़ा को लोभ में नहीं बदलने दिया।
उन्होंने राम की पादुकाएँ लेकर सिंहासन पर स्थापित कीं। यह केवल एक प्रतीक नहीं था, बल्कि एक संकल्प था। वे राज्य का संचालन करेंगे, पर स्वामी बनकर नहीं, सेवक और संरक्षक बनकर। इसी कारण भरत की कथा नेतृत्व को नया अर्थ देती है।
बच्चों के लिए भी यह कथा सुंदर है, क्योंकि वे समझ सकते हैं कि किसी प्रिय वस्तु को संभालकर लौटाना कितना विश्वास माँगता है। भरत ने एक वस्तु नहीं, पूरे राज्य को विश्वास से सँभाला। पादुकाएँ बताती हैं कि सच्ची सत्ता वह है जो स्वयं को पीछे रखकर धर्म को आगे रखे।