गोकुल में वह एक साधारण सा दिन था. दूध उबल रहा था, माखन मथा जा रहा था, बछड़े अपनी माताओं के पास थे और बच्चे आँगन में खेलते हुए हँस रहे थे. इस रोज़मर्रा की खुशियों के बीच यशोदा की नज़र बार-बार अपने छोटे कृष्ण पर ही जाती थी. माँ का प्रेम अक्सर बड़े शब्दों में नहीं, छोटी-छोटी सावधानियों में दिखाई देता है.
तभी कुछ बच्चे दौड़ते हुए आए और बोले, "कृष्ण ने मिट्टी खा ली." यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं लग रही थी. यशोदा ने किसी चमत्कार की नहीं, बस एक शरारती बच्चे की चिंता की. उन्होंने कृष्ण को पास बुलाया और कहा, "मुख खोलो." वह एक माँ की स्वाभाविक सख्ती और प्रेम से भरा क्षण था.
पर जब कृष्ण ने मुख खोला, तो यशोदा ने केवल मिट्टी नहीं देखी. परंपरा कहती है कि उन्होंने उसमें आकाश, तारे, धरती, नदियाँ, पर्वत और समूचे जगत का विस्तार देखा. जैसे एक छोटे से स्थान में अनंत समाया हो. उस क्षण उन्हें लगा कि उनके सामने खड़ा बालक वही है जिसे वह गोद में उठाती हैं, पर उसमें कुछ ऐसा भी है जो शब्दों से परे है.
इस कथा की सुंदरता यही है कि वह विस्मय यशोदा को कृष्ण से दूर नहीं ले गया. उन्होंने फिर भी कृष्ण को प्रेम से बाँहों में भर लिया. मानो कथा कह रही हो कि दिव्यता और ममता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. हम कभी-कभी साधारण क्षणों में भी बहुत बड़ा सत्य छू लेते हैं. यशोदा ने मिट्टी देखने के लिए कहा था, पर उन्हें रहस्य का दर्शन हुआ. और अंत में उन्होंने वही किया जो प्रेम करता है: उन्होंने अपने बच्चे को और भी पास कर लिया.